Friday, June 26, 2015

On international Yoga Day

On international Yoga Day
किसी ने ख्वाब दिखाया
गरीबी हटाने का
कोई संकल्प लिए था
21 वीं सदी लाने का
अब है विकास का
सबसे बडा मुद्दा
यूँ ही होते रहो टेढे मेढे
बाकी सब भूल जाने का।
-अकुभा

लघुकथा -- चुप्पी

लघुकथा
चुप्पी
दस वर्ष का रोहन बहुत ही नटखट व बातूनी बच्चा है। घर में कोई मेहमान आता है तो रोहन उससे खूब बातें करता है। माँ और पिताजी कुछ भी बात करें रोहन अपनी और से कुछ न कुछ जरूर जोड़ देता है।
जैसे कुछ दिन पहले पड़ोस से शर्माजी आए। पिताजी उनके साथ बैठ कर गप्पें लड़ा रहे थे। रोहन भी पास बैठा हर बात में अपनी राय दिए जा रहा था। माँ ने हलवे के साथ चाय लाकर परोसी। कटोरी हाथ में लेते ही रोहन के पिता बोले "अरे, हलवा ठीक से गरम तो कर ले"। रोहन बोला "पापा, आपने तो कहा था ज्यादा गरम खाने से जीभ जल जाती है"।
कल रोहन के मामा रवि मेरठ से आए थे। शायद माँ ने बुलाया था। बरामदे में पिताजी के पास बैठे थे। माँ चाय लेकर आई तो रवि ने बहन के सूजे हुए चेहरे को देखकर पूछा "यह क्या हुआ?" माँ चुप रही। रोहन भी चुप था। चुप्पी सब कुछ कह रही थी।
-अकुभा

Sunday, May 25, 2014

मधुमास मेरा

मैं लता तुम पेड़
अस्तित्व मेरा 
ज्यों धरा सा घूमना 
भाग्य मेरा. 
सूर्योद्य सा आना 
मन-पटल में 
एक अजर अथाह  
मधुमास मेरा  - अकुभा

Impasse


Sunday, May 11, 2014

यादें

कल जो बरसी थी घटा
बैठी आज पलकों पर
बरसने को है तैयार
किसी भी पल ।

टपकती बूँदों में
उभरता एक चेहरा
ख़ामोश हृदय में
जैसे रुकी सी हलचल ।

हवा का एक झोंका
पलटता है कई पन्ने
गीले सी यादों से
सराबोर भू तल ।  अकुभा 

एक और मृगतृष्णा

एक और मृगतृष्णा

एकाकी बिस्तर पर
सिरहाने बैठी वह
सपने संजोती है
काग़ज़ की नाव पर
हिचकोले खाती वह
मोती पिरोती है

मेरे मनपृष्ठ पर
आड़ी और तिरछी
रेखाएँ खींचती
बरसती मेघ बन
एक नयी वासना से
भूमि को सींचती

सूक्ष्म है, स्थूल है
मेरे मनप्राण में
संगीत की वीणा है
या मरुस्थल में
स्वयंभूत उपजी
एक और मृगतृष्णा है - अकुभा