Saturday, June 8, 2019

सफर का सामान


ये जो गहरा सा कोहरा छाया है
किसी याद में खोया है शायद समां

कोई सैलाब सा अभी आने को है
इक दर्द सा उठ रहा है सीने में यहाँ

क्या वाक़ई कोई उठ कर गया है 
कुछ ख़ाली जगह दिख रही है वहाँ

चलो बाँध लें सामान मुद्दतों के लिए
सफ़र पर चलना है न जाने कहाँ कहाँ
⁃ अकुभा

दिमाग के ताले


ऐसा कैसे कि कुछ लोग 
जैसे एक पिंजरे में बंद पंछी हों। 
देखने में उनका बदन स्वतंत्र दिखता है 
लेकिन दिमाग़ ताले में बंद हो। 
सर कटे मुर्ग़े की तरह उछलते हैं 
राष्ट्रवाद के नाम से
आजतक जैसे भारत 
केवल उन जैसे देशभक्तों के कारण ही
बचा हुआ है, 
वरना न जाने कब का लुट गया होता
हज़ारों वर्षों पुरानी संस्कृति 
बस अभी के अभी डूबने वाली है
और उसको बचाने के लिए
उनका अवतार हुआ है
उनके अलावा देश के १३० करोड़ लोग
दुर्भाग्यवश पाकिस्तान जाने से रह गए

देश के महानतम नेता
जैसे बापू और नेहरू
के नाम पर कीचड़ उछालते हुए
इन्हें कोई शर्म नहीं आती
चाहे इसके लिए 
ये कितने ही झूठ व प्रपंच फैलाएँ

इन्हें क्या लगता है
इनके इस झूठे अलाप से
हज़ारों साल पुरानी ये सभ्यता
असभ्यता में परिवर्तित हो जाएगी? 

⁃ अकुभा 

किताबें



पड़ी हैं मेरे सीने में बहुत बड़ी सी किताबें
लिखीं हैं जिनमें वो बातें जो तुमसे कह नहीं पाया

बहुत सी ख्वाईशें हैं, और बहुत सी उम्मीदें भी
कहनी थीं जो तुमसे मगर कभी मैं कह नहीं पाया

कुछ दर्द भीं हैं और शिकवे और शिकायत हैं
जिन्हें न कहने की यहाँ पुरानी रवायत हैं

कुछ ऐसे क़िस्से हैं जो तुमसे करने थे मुझे साझा
मगर डर था सुन कर न जाने तुम क्या क्या सोचोगी

ज़िंदगी की बहुत सी कड़वी मीठी यादें हैं मेरी
जिन्हें सुन कर न जाने तुम ख़ुश होगी या न होगी

सोचता हूँ कभी ये सारी किताबें तुमको दे डालूँ
ज़हन हल्का मैं कर डालूँ और चैन से सो जाऊँ 

मगर डरता हूँ बदले में कहीं तुम भी न दे डालो
और बड़ी किताबें, बोझ में जिनके मैं दब जाऊँ 
⁃ अकुभा

ईश्वर

तराशा था ईश्वर को
भव्यता व एकाग्रता सहित
खण्डित कर मैंने ही
विसर्जित कर डाला
हाय रे क्यों न तराशा मैंने
मन को अपने सुंदर स्वप्न में
क्यों न पहनी फूलों की माला
⁃ अकुभा

कर्ज 2


रात की चाल है क्यों धीमी
पग पग उठ रहे सवाल
नियति की डोर 
है बड़ी कमज़ोर 
झर झर बहते हैं
पिघले हुए कई साल 
टूटे काँच सी 
बिखरी आशाएँ 
वक़्त के पाँवों से
रिसते दर्दीले ज़ख़्म 

दूर कहीं पेड़ की टहनी पर
झूलता था बचपन
साँझ ढलते ढलते 
कोहरा में डूब गया 

विश्वास था बल था
चाल में रवानी थी
जोश की गाड़ी में
दौड़ती जवानी थी

कितने रास्तों पर 
नंगे पाँव भागते
फफोलों से तजुरबे
रूह पर उभरे

सूखी लकड़ी सी
उम्र की शाम
गिरे पत्तों के ढेरों पर
चरमराते पाँव 
पल पल बीते सालों का 
मिटता हिसाब 
लिखती है समय की सुई
क्योंकर कुछ क़र्ज़ 
चुकाना रह गया

भक्तों का गीत



परदा पड़ा है अक़्ल पर
बकते है बदज़ुबान
कानों से सुनते कुछ मगर
सुनता कुछ और दिमाग़ ।

कहने को धर्म के रखवाले
मुँह पर देशो समाज
उगलते हैं आग हर वक़्त 
वहशियत पे करते नाज ।

करते हैं राम की बातें 
मन से हैं हराम
जानवर की करते पूजा
इन्सां का क़त्लेआम ।

गौतम की इस ज़मीन पर
गांधी का किया ख़ून 
दंगों की राजनीति है
बेइज़्ज़त हर क़ानून।

कब तक चलेगा ये जुनूँ
कब तक ये गंदगी
आख़िर कभी तो रुकेगी
ये दौरे दरिंदगी।
-अकुभा

हाला

जुनूँ है, इश्क़ है, प्याला है
देखो तो चाय, पियो तो हाला है
मुस्कुरा ले नशा है जब तक
बाद में न जाने क्या होने वाला है।
-अकुभा